Tuesday, March 23, 2010

आतंकवाद की समस्या का समाधान

आतंकवाद से सारी दुनिया जुझ रही है| आतंकवाद एक विश्व व्यापी समस्या बन गयी है और इसकी जड़े सारे ससार में फैलती जा रही हैं| दरअसल आतंकवाद प्राचीन काल से ही इस संसार में एक बड़ी समस्या के रूप में विद्यमान रहा है| इस समस्या के निदान के लिए भगवान राम का चरित्र याद आता है| भगवान राम को उनके सुख-समृद्धि पूर्ण व सदाचार युक्‍त शासन के लिए याद किया जाता है। उन्‍हें भगवान विष्‍णु का अवतार माना जाता है| जो पृथ्‍वी पर मनुष्‍य रूप में असुर राजा, आसुरी आतंकवादी रावण से युद्ध लड़ने के लिए आए। उनका राम राज्‍य अर्थात राम का शासन शांति व समृद्धि की अवधि का पर्यायवाची बन गया है।भगवान राम जिस युग में जन्मे उस युग में भी आसुरी आतंकवाद फैला हुआ था| पड़ोसी देश के शक्तिशाली अधिपति रावण ने सपूर्ण भारत में अपने आसुरी आतंकी ठिकाने बना रखे थे| विभिन्न आसुरी आतंकवादी सगठनों का वह प्रायोजक था| देश का कोना कोना उसके दहशत भरे कारनामों से थर्राया हुआ था| सूर्पनखा,ताड़का,खर,दूषण,त्रिशरा,सुबाहु,मारीच इत्यादि उसके आसुरी आतंकवादी सहयोगी थे| जो देश के विभिन्न भागों में आसुरी आतंकवादी गतिविधियां संचालित करते थे| कमजोर और निर्बल जनता भयभीत हो कर अपनी इच्छाओं का दमन करके रावण की आसुरी संस्कृति का अनुसरण करने लगी और कायर शासकों ने बिना विरोध के रावण की पराधीनता स्वीकार कर ली| देश की ऐसी दुर्दशा देख कर आतंकवाद के चक्रव्युह को ध्वस्त करने के लिए भगवान श्री राम ने अपने बल, पराक्रम तथा बुध्दि का प्रयोग करना शुरू किया तो उस समय का सम्पूर्ण आसुरी आतंकवाद श्री राम के विरुद्ध संगठित हो गया| जिसमें उस समाज के कुटिल,बुद्दिजीवी, विचारक भी आसुरी आतंकवाद की मदद कर रहे थे| समाज में हमेशा ही अच्छी और बुरी दो विचार धाराए रहती आयी हैं| स्वाभाविक है की उस काल के समाज में अच्छे बुद्दिजीवी, महात्मा, विचारक भी थे जो आतंकवाद से समाज को बचाना चाहते थे| समाज का यही विचारक, बुद्दिजीवी वर्ग जनमानस को जीवन बल देने का काम करता था| जो उस काल में ऋषि कहलाते थे| श्री राम ने इस बात को समझ लिया था कि यदि ऋषि जीवित है तो समाज जीवित रहेगा| इसलिए श्री राम ने आतंकवाद के विरुद्ध देश के ऋषियों को संगठित कर उनका मार्ग दर्शन लिया| महर्षि विश्वामित्र के मार्गदर्शन में उन्होंने आसुरी आतंक के ठिकानों को नष्ट करना शुरू किया| मारीच भाग गया, सुबाहु और ताड़का मारे गए, परन्तु यह आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध का केवल प्रारम्भ था| इसको और अधिक गति देने के लिए सत्ता और सिहासन का लोभ त्याग कर श्री राम बनवासी बने| जनता बनकर जनता के बीच जाकर उनके सुख दुःख को समझा और भाई भरत द्वारा राज्य का अधिकार ग्रहण करने की प्रार्थना और आग्रह को प्रेमपूर्वक अपने भाई को अपना उद्देश्य समझाते हुए वापस लौटने के लिए मना लिया| भाई भरत को भी श्री राम के उद्देश्य की महानता और पवित्रता समझ आयी| एक ओर भरत ने शासन तंत्र संभाला दूसरी ओर राम जन जन के बीच में गए बन बन भटके| बनवासी, अरण्यवासी जनता तथा ऋषियों की पीड़ा और कष्टों को समझा और आतंकवाद जनित पीड़ा देख कर उन्होंने शत्रुओं के गढ़ में घुस कर आतंकवादी ठिकानों को ध्वस्त करने का संकल्प लिया, बड़े साहस की बात थी उन्होंने भुजा उठा कर प्रण लिया “आतंकवादी असुरता को दुनिया से मिटा दूँगा” | यह प्रण करने के साथ ही वे ऋषियों से जा जा कर मिले और उनको आश्वस्त किया| लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं था उनकी आतंकवाद विरोधी नीति का तीसरा बिंदु था— अच्छी विचारधाराओं वालों और आम जनता को संगठित करके एक व्यापक जन अभियान को जन्म देना| तेजस्वी , विचारक महर्षि अगस्त्य जहां एक ओर उनके इस अभियान के प्राण थे , वहीं सामान्य बनवासियों ,कोल-किरातों और वानरों तक का उनको सहयोग प्राप्त हो रहा था| आतंकवाद से संघर्ष यह किसी शासक का नहीं बल्कि आम जनता का नारा बन गया था| इस व्यापक जन अभियान का प्रभाव रावण के गढ़ में भी पड़ने लगा और उसकी जनता तथा उसके भाइयों यहाँ तक की उसकी पत्नी मन्दोदरी भी रावण की आतंकवादी नीतिओं का विरोध करने लगे| जिस कारण वह श्री राम से भयभीत होगया|इस व्यापक जन अभियान से जननायक श्री राम ने एक के बाद एक आतंकवादी ठिकानों को नष्ट करना आरम्भ कर दिया| दण्डकारण्य में अपना ठिकाना बनाये हुए खर –दूषण और त्रिशरा अपने हजारों साथियों सहित मारे गए| आतंकवाद की इस हार से उनका शासक रावण बौखला उठा| उसने छद्मवेश बना कर सीता का अपहरण कर लिया| यह अकेले श्री राम की नहीं बल्कि देश की जनता की भावनावों पर चोट थी| दरअसल आतंकवाद का लक्ष्य एक ही होता है- आम जनता के भाईचारे तथा अच्छे विचारों को ध्वस्त करना, और इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह किसी भी सीमा तक जा सकता है|आतंकवादी देश के अधिपति को समझाने के सारे प्रयास विफल हो जाने के पश्चात अन्तिम समाधान के रूप में राम ने रावण पर आक्रमण किया| सम्भवतः यह मानव इतिहास का सबसे भीषण युद्ध था| परन्तु समाज के हित की जनभावनाओं को सफलता अवश्य मिलती है, इसलिए अन्त में आतंकवाद का खात्मा हो गया| श्री राम ने आतंकवाद को जड़ मूल से मिटा दिया| यदि हमारे देश के नागरिक,शासक और अच्छे विचारक नियमबद्ध प्रणाली, मानसिक परिपक्कवता और ईमानदारीपूर्वक अपना उद्देश्य निर्धारित कर आतंकवाद को समाप्त के बारे में भगवान श्री राम की नीतियों का पालन करने हेतु जनआन्दोलन करेंतो आतंकवाद की समस्याओं का अन्त अवश्य हो सकता है| जय जय श्री राम !!

Sunday, March 14, 2010

हमें अपनी कमियों से लड़ने कि आदत डालनी चाहिए

एक शक्तिशाली शासक था तथा हर कोई उसकी वीरता और शासन के प्रबंध की तारीफ किया करता था| किन्तु उस शासक के चेहरे पर एक भद्दा सा दाग था| उस शासक की वीरता और शासन का कुशल प्रबंधक होने के कारण उस शासक के चेहरे के दाग के बारे में कोई भी व्यक्ति कुछ भी कह सकने का साहस नहीं रखता था|

एक बार एक चित्रकार ने उस शासक का चित्र बनाते समय चित्र में शासक के चेहरे के दाग को छुपा दिया और बड़ा सुन्दर सा चेहरा चित्रित कर दिया| उसे आशा थी की वह शक्तिशाली शासक उसके इस कार्य से प्रसन्न होगा और चित्र में उसकी बदसूरती को दूर करके चित्रित करने के कारण उसे भरपूर ईनाम देगा|

अपना सुन्दर सा चित्र देख कर उस शासक ने कहा- नहीं -नहीं मैं जैसा बदसूरत हूँ , मेरा वैसा ही चित्र बनाओ| चित्रकार खुशामदी किस्म का व्यक्ति था वह बोला- आप ऐसा क्यों कह रहे हैं ? क्या यह चित्र अच्छा नहीं बना है ? मैं आप का अभिप्राय समझ नहीं पाया ? चित्रकार की पीठ थपथपा कर शासक ने कहा- तुम फ़िक्र मत करो| मुझे अपनी कमियों से लड़ने की आदत हो चुकी है| जीवन कि ऊँचाई कमजोरियों को छिपाने में नहीं है, उन्हें दूर करने में है| यदि कोई मुझे मेरी निर्बलताए न बतलाता,तो भला मैं कैसे अपनी कमजोरिओं को दूर सकता और आज इतना सफल शासक बन पाता ? उस शासक ने विस्तृत रूप से समझाते हुए कहा कि “ मैंने अपने चेहरे कि कुरूपता को अपनी योग्यता और वीरता के अद्भुत कार्यों से ढँक दिया है| चेहरे का निर्माण करना तो ऊपर वाले के हाथ में था| लेकिन अपनी आदतों को अच्छा बनाना, सत्कर्म करना, वीरत्व के मार्ग पर चलना, सचरित्रवान बनना तो मेरे अपने हाथ में था और मैंने अपने कर्तव्य का पालन सच्चे दिल से किया है| उस शासक का यह उदाहरण हमें बाहरी सौन्दर्य तक ही स्वयं को सीमित न रखने और कुरूपता, विकलांगता या किसी अन्य व्याधि से ग्रस्त होने के बावजूद भी निराशा और चिंता से मुक्त बने रहने का दिव्य सन्देश देता है | हमें अपनी कमजोरियों को दूर करना चाहिए, न कि चिंतित और निराश हो कर बैठ जाना चाहिए| मन में जब असमर्थता या हीनता का भाव आता है तो हम अपने आत्मबल को भूल जाते हैं| निराशा और चिंता के विचारों का घातक प्रभाव शरीर की प्रतिरोधक शक्ति पर पड़ता है , शरीर की प्रतिरोधक शक्ति ही हमें विरोधी वातावरण से संघर्ष कर सकने में सक्षम बनाती है| इसलिए किन्ही भी परिस्थितियों में निराशा और चिंता के भावों को अपने पास भी नहीं आने देना चाहिए| आशा और उत्साह से ही हममें ईश्वर पर विश्वास तथा मन में पवित्रता बनी रह सकती है|


Sunday, March 7, 2010

दर्द और पीड़ा से मानव जीवन का सम्बन्ध

दर्द और पीड़ा मानव जीवन के अस्तित्व के लिए एक आवश्यक शर्त है| अगर हमारे शरीर और दिमाग में दर्द प्रणाली नहीं हो तो हम अधिक समय तक जीवित नहीं रह पायेंगे|
हमारे जीवन में अत्यधिक दर्द और पीड़ा की उपस्थिति दार्शनिक एवं मनोवैज्ञानिक समस्या उत्त्पन्न करती है| विचार करने की बात यह है कि यह संसार एक शक्तिशाली और हमारे प्यारे भगवान के नियन्त्रण में है तो इतना अधिक दर्द ,पीडा और मृत्यु के लिए इस संसार में स्थान क्यों है? विशेष रूप से जब कि संसार के सभी धर्म एक स्वर में इसे स्वीकार करते हैं कि दर्द,पीड़ा और मृत्यु सभी बाते भगवान के नियंत्रण में हैं |
           दार्शनिक और धर्मशास्त्री इसे आध्यात्म की  संज्ञा देते हैं| कई महान दार्शनिकों और विचारकों के मध्य इस विवादास्पद मुद्दे पर दुनिया भर में बहस हो चुकी है| आध्यात्म एक ऐसा सिद्दांत जो भगवान के प्रत्येक कार्य को जायज ठहराता है| सारे संसार की बुराइयों, दुखों, मनुष्यों में दर्द, पीड़ा और मृत्यु का दोष ईश्वर पर दिए जाने के बावजूद भी हम उसे प्यार करने वाला और सर्वशक्तिमान मानते हैं|
                  प्रश्न यह उत्त्पन्न होता है कि मनुष्य द्वारा मनुष्य कि हत्या तथा मनुष्य द्वारा मनुष्य को दर्द और पीड़ा प्रदान किये जाने को भगवान कि इच्छा या न्याय कैसे मान लिया जाये| कई दार्शनिकों और विचारकों का मानना है कि दुःख कि प्रवृति ही मानव व्यक्तित्व में सर्वोत्तम गुणों के विकास को भी उत्पन्न करने की भूमिका निभाती हैं| दर्द और पीड़ा के अभाव में मनुष्य के अनेक गुण जैसे प्रेम, करुणा, दया,उदारता,निस्वार्थता बड़े पैमाने में मनुष्य में विकसित नहीं हो सकती हैं| यह गुण मानव के अच्छे चरित्र को शक्ति देते हैं| मानव का दर्द परमेश्वर के अच्छे उदेश्य के लिए कार्य करता है| हमारे जीवन में दुखों का सामना करने के लिए बहुत से संत महात्माओ द्वारा यही तर्क प्रस्तुत किया जाता रहा है|
       हालांकि चिकित्सा विज्ञान के आधार पर वैज्ञानिको ने दूसरे तर्क के अनुसार यह सिद्दान्त निर्धारित किया है कि मानव अस्तित्व के लिए दर्द और पीड़ा क्यों जरुरी हैं| जिसे चार्ल्स डार्विन के अनुसार विकास का सिद्दान्त बतलाया गया है| प्रकृति ने प्राकृतिक चयन को दर्द के सिद्दान्त पर आधारित तंत्र का चुनाव किया है| मातृत्व में प्रजनन के समय दर्द और पीड़ा ही मनुष्य को इस धरा पर लाने में सहायक होती है|  
              एक दिलचस्प बात पर ध्यान दें कि इस संसार में कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने दर्द किसे कहते हैं वो जानते ही नहीं हैं, कारण यह है कि उन्होंने दर्द को कभी महसूस ही नहीं किया है और इस कारण उनका जीवन काल आमतौर पर कम समय के लिए रहता है| इस दुर्लभ अनुवांशिक जन्मजात असामान्य बीमारी को “congenital insensitivity to pain with the unhidrosis’’(CIPA) कहते हैं|  इस बीमारी में मरीज को दर्द कि संवेदना नहीं होती है| इस कारण इस रोग से प्रभावित दर्द क्या होता है यह समझ ही नहीं पाते हैं| इस बीमारी के कारण एक अनुवांशिक शारीरिक उत्परिवर्तन होता है जो तंत्रिका कोशिकाओं में किसी निर्माण तथा मस्तिष्क को शरीर के दर्द, गर्मी तथा सर्दी इत्यादि के संकेत नहीं भेजने के लिए जिम्मेदार होता है|  जिस कारण इस रोग के रोगी विभिन्न प्रकार कि शारीरिक अक्षमता कि जटिलताओं का शिकार बन जाते हैं, क्योंकि दर्द महसूस न कर पाने की शारीरिक कमी के कारण बहुत सी अंदरूनी दर्दों को बतला नहीं पाते हैं| जैसे घुटनों की चोट, दांतों का दर्द ,आँखों की चोट इत्यादि| प्रकृति ने प्राकृतिक चयन के लिए दर्द की व्यवस्था पसंद की है और पीड़ा को झेलने की शक्ति जब तक हममें नहीं होगी, हम अधिक समय तक संघर्ष नहीं कर पायेंगे फलस्वरूप हमारा जीवनचक्र संक्षेपित हो जायेगा| 

Thursday, March 4, 2010