Monday, October 5, 2009

मनुष्य का मन


एक कमरे में एक सज्जन बैठे थे. दीवार पर घडी लगी हुई थी .लगातार चलती हुई यह टक टक कर रही थी .वह सज्जन इसकी टक टक को सुन रहे थे . बाहर गली में ऊँची ध्वनि से बाजे बजने लगे .इस सज्जन को घडी की ध्वनि आनी बंद हो गई . भयभीत होकर उसने नौकर को बुलाकर कहा- देखो तो शायद यह घडी चलनी बंद हो गई है . इसकी ध्वनि सुनाई नहीं पड़ती. नौकर ने ध्यान से घडी को देखा . वास्तविक बात को समझ कर बोला " घडी बंद नहीं हुई है . बाहर की ध्वनि इतनी अधिक है कि घडी कि टकटक सुनाई नहीं दे रही है " इसी प्रकार मनुष्य का मन एक कमरा है . इसके अन्दर ईश्वर की ध्वनि घडी की तरह लगातार टकटक करती है , लगातार बोलती है .किन्तु बाहर की इच्छाओं और वासनाओं के जो बाजे हमने बजा रखे हैं . उन्होंने इस ध्वनि को ही दबा दिया है . अन्दर की इस आवाज सुनने के लिए बाहर की वासनाओं और इच्छाओं के बाजों को बंद करना होगा. तभी ईश्वर का दर्शन होगा और तभी उनकी ध्वनि सुनाई देती है .

No comments:

Post a Comment